बुरहानपुर में हजरत शाह दोम दोम शहदावल मलिक बाबा का संदल (उर्स) इतनी भव्यता के साथ संपन्न हुआ। बुरहानपुर की गंगा-जमुनी तहजीब का एक सुंदर उदाहरण है
दिनांक 27 अप्रैल 2026, सोमवार को समय 5:47 pm को यह बड़े ही उत्साह के साथ यह जुलूस निकाला गया। ढोल ताशे की आवाज में युवा नौजवान झूमते हुए दिखाई दिए हजरत शाह दोम दोम शहदावल मलिक बाबा का यह संदल वास्तव में सांप्रदायिक सौहार्द और अटूट आस्था का जीवंत प्रमाण है। शहदावल मलिक बाबा के प्रति लोगों की मान्यता है कि यहाँ आने वाला कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता। यही कारण है कि 'जनसैलाब' केवल एक शब्द नहीं, बल्कि लोगों का बाबा के प्रति प्रेम है।
अखाड़ों का हैरतअंगेज प्रदर्शन
जुलूस में शामिल पारंपरिक अखाड़ों के उस्तादों और युवाओं ने शस्त्र कला का जो प्रदर्शन किया, वह देखने लायक था। विशेष रूप से' करतब दिखाते युवाओं ने दर्शकों की सांसें थाम दीं। यह कला न केवल मनोरंजन है, बल्कि हमारी प्राचीन व्यायाम परंपरा को भी जीवित रखे हुए है।
यहाँ इस आयोजन की कुछ प्रमुख झलकियाँ दी गई हैं:
प्रारंभिक स्थल: संदल की शुरुआत ज़ीरो शोरूम के पास से हुई, जो शहर का एक प्रमुख केंद्र है।
कला और प्रदर्शन: जुलूस में विभिन्न कलाकारों ने अपनी झांकियों के माध्यम से शानदार प्रदर्शन किया। इसमें अखाड़ों के प्रदर्शन, सूफियाना कलाम और पारंपरिक ढोल ताशा के साथ संदल निकल गया
सांस्कृतिक महत्व: बुरहानपुर ऐतिहासिक रूप से सूफी संतों की नगरी रही है। शहदावल मलिक बाबा के दरबार में हर धर्म और समुदाय के लोग अपनी आस्था लेकर पहुँचते हैं, जो शहर की एकता को दर्शाता है।
जनसैलाब: अक्सर इन संदल कार्यक्रमों में शहर और आसपास के क्षेत्रों से भारी संख्या में अकीदतमंद (श्रद्धालु) शिरकत करते हैं, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है।
सजी-धजी पालकी और झांकियां
ज़ीरो शोरूम से शुरू हुए इस संदल में बाबा के दरबार की ओर बढ़ती फूलों से सजी मुबारक पालकी आकर्षण का मुख्य केंद्र थी। बुरहानपुर के ऐतिहासिक महत्व और सूफी परंपराओं को दर्शा रही थीं।
बुरहानपुर के स्थानीय इतिहास और परंपराओं में इन आयोजनों का बहुत बड़ा स्थान है। क्या आप इस संदल की किसी विशेष झांकी या कलाकार के प्रदर्शन के बारे में विस्तार से बताना चाहेंगे जिसने सबका मन मोह लिया





टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें