उड़ीसा के क्योंझर से आई एक खबर फिर शर्मिंदा करती है और हमसे सवाल करती है कि आखिर हमारा सिस्टम किसके लिए काम करता है बैंक अधिकारियों का यह कहना कि "खाताधारक को खुद आना होगा", जबकि उन्हें सूचित किया जा चुका था कि उनकी मृत्यु हो गई है, यह दर्शाता है कि हमारा सिस्टम मशीन की तरह काम कर रहा है। नियमों का उद्देश्य व्यवस्था बनाना होता है, लेकिन जब वही नियम किसी के लिए प्रताड़ना बन जाएं, तो वे अपनी सार्थकता खो देते हैं। एक गरीब आदिवासी युवक जीतू मुंडा की बहन की दो महीने पहले मौत हो गई थी. उसकी बहन के खाते में ₹19,300 बचे थे — कोई बड़ी रकम नहीं, लेकिन उसके जैसे इंसान के लिए वही जीवन और मौत का फर्क हो सकती थी. वह बार-बार बैंक गया, हाथ जोड़े और कहा कि उसे उसकी मरहूम बहन के खाते के पैसे की सख्त जरूरत है. उसे एक ही जवाब मिला — “खाताधारक को खुद आकर साइन करना होगा” उसने हर बार सफाई दी कि उसकी बहन अब इस दुनिया में नहीं है. लेकिन उसकी बात किसी ने नहीं सुनी, कागज़ के काल्पनिक नियम इंसान की सच्चाई से बड़े हो गए. संवेदनाएं हमारे समाज में गरीबी की विवशताओं पर कब का अहसास खो चुकी हैं ! और फिर जो...
बुरहानपुर में हजरत शाह दोम दोम शहदावल मलिक बाबा का संदल (उर्स) इतनी भव्यता के साथ संपन्न हुआ। बुरहानपुर की गंगा-जमुनी तहजीब का एक सुंदर उदाहरण है दिनांक 27 अप्रैल 2026, सोमवार को समय 5:47 pm को यह बड़े ही उत्साह के साथ यह जुलूस निकाला गया। ढोल ताशे की आवाज में युवा नौजवान झूमते हुए दिखाई दिए हजरत शाह दोम दोम शहदावल मलिक बाबा का यह संदल वास्तव में सांप्रदायिक सौहार्द और अटूट आस्था का जीवंत प्रमाण है। शहदावल मलिक बाबा के प्रति लोगों की मान्यता है कि यहाँ आने वाला कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता। यही कारण है कि 'जनसैलाब' केवल एक शब्द नहीं, बल्कि लोगों का बाबा के प्रति प्रेम है। अखाड़ों का हैरतअंगेज प्रदर्शन जुलूस में शामिल पारंपरिक अखाड़ों के उस्तादों और युवाओं ने शस्त्र कला का जो प्रदर्शन किया, वह देखने लायक था। विशेष रूप से' करतब दिखाते युवाओं ने दर्शकों की सांसें थाम दीं। यह कला न केवल मनोरंजन है, बल्कि हमारी प्राचीन व्यायाम परंपरा को भी जीवित रखे हुए है। यहाँ इस आयोजन की कुछ प्रमुख झलकियाँ दी गई हैं: प्रारंभिक स्थल: संदल की शुरुआत ज़ीरो शोरूम के पास से हुई, जो शहर का ...