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'पेट माफिया' नहीं, यह नियोजित अपराध है: रेत का अवैध कारोबार, सामने आने वालों को मार देते हैं…

 गरीबी बेरोजगारी नहीं, यह करोड़ों का व्यापार है;


मप्र खासकर ग्वालियर, चम्बल संभाग में अवैध रेत खनन का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। प्रदेश के कृषि मंत्री एदल सिंह कंषाना के 'रेत नहीं पेट माफिया' वाले बयान के बाद से रेत खनन को लेकर अच्छी खासी बहस छिड़ गई है।

कंसाना का कहना है कि लोग अजीविका के लिए ऐसा कर रहे हैं, लेकिन अवैध खनन में लिप्त 'पेट माफिया' किसी कि हत्या कर दें या हिंसक गतिविधियों को अंजाम दें, तो उसे क्या कहा जाए? एक तरफ अवैध रेत खनन में लगे लोग सरकारी कर्मचारियों पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं, वहीं मंत्री का उनके समर्थन में बयान कई सवाल खड़े कर रहा है।

लगभग एक दशक से चम्बल सेंचुरी के लगभग साढ़े चार सौ किमी के इलाके में रेत खनन पर पूरी तरह पाबंदी है, बावजूद इसके चम्बल में रेत का अवैध खनन पूरे जोर-शोर से चल रहा है। इन हालातों को देखते हुए सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। अफसोस की बात तो यह है कि सत्तारुढ़ दल के स्थानीय नेताओं ने भी कभी अवैध रेत खनन को रोकने के लिए कोई पहल नहीं की है।

कम नहीं हो रही रेत माफिया की गुंडागर्दी

पिछले कुछ सालों में ग्वालियर-चम्बल में रेत माफिया की गुंडागर्दी इस हद तक बढ़ गई है कि वे लोगों की जान लेने पर आमादा हैं। भिण्ड कलेक्टर के आवास पर पथराव या सड़क पर पुलिस और वन अधिकारियों को ट्रैक्टर डंपर से कुचलने की घटनाओं में जबर्दस्त इजाफा हुआ है।

2024-25 में ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं, जो रेत माफिया के दुस्साहस को बयां करती हैं। मुरैना में वन विभाग की टीम ने रेत से भरे एक ट्रैक्टर को पकड़ा, लेकिन कुछ देर में ही माफिया इसे सरेआम छुड़ाकर ले गया। इससे कुछ वर्षों पहले 8 मार्च 2012 में तो आईपीएस नरेन्द्र कुमार की रेत माफिया द्वारा सरेआम हत्या की घटना को आज भी लोग भूले नहीं हैं।

इसके बाद 5 अप्रैल 2015 को सिपाही अतिबल सिंह, 7 मई 16 को फॉरेस्ट गार्ड नरेन्द्र शर्मा को ट्रैक्टर से कुचलकर मार डाला गया। रेत माफिया की गुंडगर्दी यहीं तक नहीं है। इनके हिंसक कारनामों की एक लम्बी फेहरिस्त है, लेकिन अफसोस की बात है कि रेत माफिया पर आज तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी है।

सरकार की गंभीरता पर सवाल

मंत्री कंषाना का कहना है कि कुछ लोग गरीबी और बेरोजगारी के कारण अवैध खनन में शामिल हो रहे हैं, लेकिन उनका यह बयान हिंसा और संगीन अपराध की तरफदारी करता है। ट्रैक्टर से कुचलकर हत्याएं करना या अधिकारियों पर हमले सिर्फ 'पेट भरने' की मजबूरी नहीं है, बल्कि एक प्रकार का नियोजित अपराध है। सरकार भी इस रोक नहीं पा रही, यह बात गंभीर है।

ये कैसे पेट माफिया?

रेत के अवैध कारोबार में लगे लोग कितने गरीब व बेरोजगार हैं, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके पास ट्रैक्टर, डम्पर, जेसीबी तो है ही, वे हथियार भी रखते हैं, और तो और फॉर्चुनर, स्कॉर्पियों जैसी गाड़ियों में भी चलते है। इन्हें स्थानीय राजनेताओं का भरपूर समर्थन है।

वास्तव में रेत माफिया एक संगठित गिरोह की तरह काम कर रहा है। हिंसक घटनाएं करके इन्होंने इस हद तक दहशत फैला दी है कि सरकारी अधिकारी-कर्मचारी भी अब अवैध उत्खनन रोकने से डरते हैं।

करोड़ों में है रेत का अवैध व्‍यापार

ग्वालियर-चम्बल में रेत का कारोबार करोड़ों में है। एक ट्रक रेत से 10 से 25 हजार तक की कमाई होती है। थोड़ा बहुत बांट भी दिया जाए तो भी 10 से 20 हजार की बचत है। सैकड़ों ट्रक व ट्रैक्टर इस काम में लगे हैं। जाहिर है यह पेट भरने का काम नहीं है, बल्कि यह बड़ा व्‍यापार है। इसमें होने वाले मुनाफे में कौन-कौन भागीदार है, इसकी पड़ताल जरूरी है। 



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